आखिर क्यों छिना Makhana Research Center of Darbhanga से राष्ट्रीय दर्जा?

0
0

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार कार्यकाल के दौरान 2002 में बिहार के मिथिलांचल स्थित दरभंगा में राष्ट्रीय मखाना अनुसंधान केंद्र खुला था, जिसका मकसद इलाके में उपलब्ध जलाशयों में मखाने की खेती को बढ़ावा देकर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती देना था। मगर, बाद में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार के कार्यकाल के दौरान 2005 में इस केंद्र का राष्ट्रीय दर्जा समाप्त कर दिया गया, जिससे मखाना अनुसंधान के क्षेत्र में जिस तरह की कल्पना लोगों ने की खेती वैसा कुछ नहीं हो पाया।

इस अनुसंधान केंद्र का राष्ट्रीय दर्जा समाप्त होने का जो कारण लोग बताते हैं, वह काफी चौंकाने वाला है।

मधुबनी के मखाना उत्पादक किसान कपिल देव झा ने आईएएनएस को बताया कि राष्ट्रीय मखाना अनुसंधान केंद्र, दरभंगा में पदस्थापित अधिकारी प्राय: पटना में रहते थे, क्योंकि उस समय दरभंगा में बिजली की स्थिति अच्छी नहीं थी, इसी कारण से इस केंद्र का राष्ट्रीय दर्जा समाप्त कर इसे भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के पटना स्थित पूर्वी अनुसंधान परिसर से जोड़ दिया गया। अनुसंधान केंद्र का पूर्व दर्जा बहाल करने की मांग को लेकर अक्टूबर 2019 में देश के प्रधानमंत्री को मिथिला के किसानों की तरफ से लिखे गए पत्र में भी इस बात का जिक्र किया है।

कपिल देव झा ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब से वोकल फॉर लोकल का नारा दिया है तब से मिथिला के स्थानीय उत्पाद मखाना को प्रोत्साहन मिलने की उम्मीद जगी है, क्योंकि इस क्षेत्र में पैदा होने वाले मखाने की मांग विदेशी बाजारों में भी है।

उन्होंने बताया कि हाल ही में दरभंगा स्थित मखाना अनुसंधान केंद्र की स्थिति का जायजा लेने एक केंद्रीय टीम आई थी, जिससे लगता है कि मोदी सरकार की निगाह इस तरफ गई है, क्योंकि मखाना के महत्व पर प्रधानमंत्री पहले भी चर्चा कर चुके हैं।

दरभंगा स्थित मखाना अनुसंधान केंद्र के प्रभारी व प्रधान वैज्ञानिक डॉ. इंदुशेखर ने भी बताया कि केंद्रीय टीम आई थी। हालांकि उन्होंने टीम के दौरे या राष्ट्रीय अनुसंधान केंद्र का दर्जा समाप्त होने की वजहों के संबंध में कुछ नहीं बताया, लेकिन इलाके में मखाने की खेती से किसानों को होने वाले लाभ के बारे में जरूर बताया।

उन्होंने कहा कि मिथिलांचल में मखाने की खेती की काफी संभावना है, क्योंकि बरसात के दिनों में नेपाल से आने वाली नदियों का पानी जगह-जगह खड़ा होने से इलाके में काफी जल-जमाव का क्षेत्र है जहां मखाना, सिंघारा और अन्य जलीय उत्पादों की खेती होती है।

डॉ. इंदुशेखर ने बताया कि वैश्विक बाजार में मिथिला के मखाने और इससे बने उत्पादों की काफी मांग है। मखाने की व्यावसायिक खेती और इसके उत्पादों का निर्यात दुनिया के विभिन्न देशों में होता है।

उन्होंने कहा कि देश में ज्यादा मखाने की खेती मिथिलांचल में ही होती है, इसलिए इसकी खेती को प्रोत्साहन मिलने से किसानों की आमदनी दोगुनी करने के भारत सरकार के लक्ष्य को हासिल करने में भी मदद मिलेगी।

कारोबारी बताते हैं कि देश के बाजारों में मखाना पॉप, मखाना कुरकुरे और मखाना आटा की काफी मांग है, क्योंकि इसे ‘सुपरफूड’ कहा जाता है।

न्यूज स्त्रोत आईएएनएस

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here