लेकिन रेबीज केवल कुत्तों के ही काटने से नहीं होता, जानिए इसके बारे में

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आमतौर पर लोगों को केवल इस बात की जानकारी होती है कि कुत्ता काटे तो क्या करना है. उन्हें यह पता है कि रेबीज का इन्जेक्शन लगाना महत्वपूर्ण है, लेकिन रेबीज केवल कुत्तों के ही काटने से नहीं होता.

बंदर, बिल्ली के काटने से भी रेबीज होने कि सम्भावना है. इसके अतिरिक्त पालतू पशु जैसे गाय, बैल, घोड़ा, बकरी आदि भी रेबीज का कारण बन सकते हैं. इन जानवरों के काटने या नाखून लगाने के साथ ही इनकी लार या इनके नाखूनों में उपस्थित विषाणुओं के जरिए रेबीज बीमारी के वायरस आदमी के शरीर में प्रवेश कर जाते हैं.

कुत्तों के बाद बंदरों के काटने के मुद्दे हिंदुस्तान में दूसरे नंबर पर आते हैं. बंदरों के काटने पर केवल चोट ही नहीं लगती बल्कि जानलेवा बीमारियां भी हो सकती हैं, जिनमें घाव में संक्रमण, रेबीज के अतिरिक्त हर्पीज भी शामिल है. हर्पीज बी वायरस हिंदुस्तान के कई बंदरों में पाया जाता है. यह इतना खतरनाक है कि इस वायरस की चपेट में आने से शारीरिक विकलांगता या मृत्यु भी हो सकती है.

वहीं रेबीज वायरस सीधे आदमी के नर्वस सिस्टम व फिर आदमी के मस्तिष्क तक पहुंच जाते हैं. रेबीज वायरस जब मसल टिशूज में पहुंचते हैं, तो वह इम्यून सिस्टम से बचे रहते हैं व अपनी संख्या बढ़ाते जाते हैं. फिर ये वायरस न्यूरोमस्कुलर जंक्शन से नर्वस सिस्टम में पहुंच जाते हैं.

यहां पहुंचने के बाद ये दिमाग में सूजन पैदा कर देते हैं. इससे कारण आदमी के व्यवहार में बदलाव आ जाता है व वो बिना बात उत्तेजित हो जाता है. कुछ लोगों को पैरालिसिस यानी लकवा भी होने कि सम्भावना है. यहां तक कि कोमा में भी जा सकता है या मृत्यु हो सकती है.

डॉक्टर के पास जाने से पहले ऐसे करें प्राथमिक उपचार-
बंदर के काटने पर तुरंत चिकित्सक के पास जाना चाहिए. चिकित्सक उस घाव की जाँच करता है व आवश्यक उपचार तथा इंजेक्शन देता है. चिकित्सक के पास पहुंचने से पहले भी प्राथमिक इलाज किया जा सकता है. बंदर काट ले तो सबसे पहले काटे गए जगह को तुरंत पानी और साबुन से अच्छी तरह धो देना चाहिए.

काटे हुए घाव को देखें कि कहीं उसमें कुछ फंसा तो नहीं है जैसे कि कोई दांत, बाल या फिर धूल-मिट्टी. अगर दिखे तो तुरंत धीरे से निकालें व साफ करें. घाव बड़ा हो व खून निकल रहा हो तो पट्टी बांध दें. छोटे घाव की स्थिति में दबाकर खून निकालें ताकि खून के साथ विषाणु या जीवाणु बाहर निकल जाएं.

अब एंटी-बैक्टीरियल क्रीम लगाएं व उस पर साफ पट्टी बांधें. चिकित्सक के पास पहुंचें. वह घाव की जाँच करने के बाद रेबीज या टिटनेस का इंजेक्शन लगा सकते हैं. इन इन्जेक्शन के न लगने से आदमी की मौत भी हो सकती है. 24 घंटे में रेबीज इम्यूनोग्लोबुलीन इन्जेक्शन लगवाएं.

डॉक्टर घाव की गंभीरता के आधार पर इस इन्जेक्शन की कम से कम तीन व ज्यादा से ज्यादा पांच डोज देते हैं. घाव की स्थिति देखकर चिकित्सक आगे की इलाज प्रक्रिया प्रारम्भ कर सकता है. यह पूरी प्रक्रिया पोस्ट एक्सपोजर प्रोफीलैक्सिस (पीईपी) कहलाती है. बंदर के काटने का घाव अच्छा हो जाए तो भी बीच में उपचार छोड़ना नहीं चाहिए व इसका पूरा कोर्स लेना चाहिए.

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